साय सरकार का उद्योगों से ये कैसा डील
एमओयू और प्लेसमेंट कैंपों के खोखले दावों के बीच पिस रही छत्तीसगढ़ की युवा पीढ़ी; सस्ती जमीन और संसाधनों के एवज में राज्य को क्या मिला?
'इन्वेस्ट गढ़ छत्तीसगढ़' के गूंजते नारों और हजारों करोड़ रुपये के एमओयू (MoU) के बड़े-बड़े विज्ञापनों के बीच छत्तीसगढ़ का युवा आज एक बुनियादी सवाल पूछ रहा है—आखिर यह चमक-दमक किसके लिए है? प्रदेश में रोजगार के नाम पर एमओयू के रंग-बिरंगे पोस्टर तो सज रहे हैं, लेकिन धरातल पर न तो बड़ी फैक्ट्रियां आकार ले रही हैं और न ही स्थानीय युवाओं के चूल्हे जल रहे हैं [01:06]।
पंजीकृत बेरोजगारों की लंबी कतार
सरकारी फाइलों और आंकड़ों पर नजर डालें तो प्रदेश में पंजीकृत बेरोजगारों की स्थिति काफी भयावह नजर आती है। रोजगार कार्यालयों में पंजीकृत आंकड़ों के अनुसार:
12वीं पास: 4,08,049 युवा [02:48]
तकनीकी शिक्षा प्राप्त: 3,54,811 युवा [02:58]
स्नातक (Graduate): 2,61,412 युवा [03:06]
स्नातकोत्तर (Post Graduate): 1,56,998 युवा [03:10]
10वीं पास: 63,880 युवा [03:15]
लाखों डिग्रीधारी युवाओं की इस जमात को स्थायी सरकारी या औद्योगिक नौकरियों के बजाय 'प्लेसमेंट कैंपों' के भरोसे छोड़ दिया गया है [02:17]।
प्लेसमेंट शो: महा-आयोजन या महज औपचारिकता?
सरकारी स्तर पर अब तक 556 से अधिक प्लेसमेंट कैंप आयोजित किए जा चुके हैं, जिन पर भारी-भरकम राशि खर्च की गई [02:25]। लेकिन इनका परिणाम क्या रहा?
हालिया आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2024-25 में आयोजित 311 प्लेसमेंट कैंपों में 3,000 से अधिक अभ्यर्थी पहुंचे, जिनमें से केवल 534 युवाओं को नौकरी मिल सकी [04:35]। वहीं वर्ष 2025-26 के 245 आयोजनों में यह आंकड़ा सिमटकर 449 पर ही रह गया [04:50]। हाल ही में हुए एक आयोजन में 6,366 युवाओं ने रुचि दिखाई, 18,000 को बुलाया गया, लेकिन महज 290 लोग ही पहुंचे [04:08]।
युवाओं के इस मोहभंग का मुख्य कारण है:
1. अत्यधिक कम वेतन: 4 साल की इंजीनियरिंग के बाद भी 8,000 से 9,000 रुपये प्रति माह का ऑफर [01:46, 11:00]।
2. अमानवीय काम के घंटे: बिना किसी सुरक्षा या मेडिकल सुविधा के 12 से 14 घंटे काम [05:11, 06:40]।
3. अस्थायी नौकरी: 6 महीने का कॉन्ट्रैक्ट, जिसमें न पीएफ (PF) की गारंटी है और न ही नौकरी की स्थायित्व [06:40]।
एमओयू का सच: जमीन पर सन्नाटा
राज्य सरकार ने स्टील प्लांट, सोलर हब और आईटी सेक्टर के नाम पर कई बड़े उद्योगपतियों के साथ एमओयू किए हैं [05:36]। परंतु रायपुर, बिलासपुर, भिलाई जैसे बड़े औद्योगिक केंद्रों में भी ऐसी कोई नई बड़ी फैक्ट्री खड़ी नहीं दिखती जो 5,000 स्थानीय युवाओं को सम्मानजनक रोजगार दे सके [05:59]। कई कंपनियां सैकड़ों एकड़ उपजाऊ जमीन अधिग्रहित कर सिर्फ बाउन्ड्री वॉल बनाकर गायब हो चुकी हैं [09:04]।
'स्किल' के नाम पर छलावा और बाहरी बनाम स्थानीय का खेल
जब भी नए उद्योग स्थापित होते हैं, प्रबंधन 'कुशल जनशक्ति' (Skilled Manpower) की कमी का हवाला देकर स्थानीय युवाओं को दरकिनार कर देता है [06:51]।
मैनेजर और इंजीनियर: बिहार, कर्नाटक, उत्तर प्रदेश, गुजरात और मुंबई जैसे राज्यों से बुलाए जाते हैं [07:45]।
स्थानीय युवाओं की स्थिति: जिन ग्रामीणों की जमीनें फैक्ट्री के नाम पर ली गईं, वे अपनी ही जमीन पर गार्ड या लेबर की नौकरी पाने के लिए राजनीतिक पहुंच और सिफारिशें लगाने को मजबूर हैं [08:24, 11:21]।
हाल ही में बेरला की बारूद फैक्ट्री और धरसींवा के औद्योगिक हादसों में भी यह उजागर हुआ कि वहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी के साथ-साथ मजदूरों तक की भर्तियां बाहरी राज्यों से की गई थीं [08:04]।
युवाओं का दर्द: "डिग्री हमारी, जमीन हमारी, पर रोजगार दूसरों का"
एक इंजीनियरिंग छात्र का कहना है: "हम लाखों रुपये खर्च कर चार साल पढ़ाई करते हैं ताकि बड़ा अफसर बनें, लेकिन हमें 9,000 रुपये में 14 घंटे खटने का ऑफर मिलता है।" [10:48]
एक प्रभावित ग्रामीण ने बताया: "फैक्ट्री लगाने के वक्त बड़े-बड़े वादे किए गए थे। आज हमारी खेती भी चली गई और अब हमें सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी के लिए भी गिड़गिड़ाना पड़ता है।" [11:12]
अनुत्तरित सवाल
1. यदि राज्य का जल, जंगल, कोयला, लोहा और बॉक्साइट उद्योगपतियों को रियायती दरों पर दिया जा रहा है, तो उसके बदले स्थानीय युवाओं को गारंटीड रोजगार क्यों नहीं मिल रहा? [08:44, 10:02]
2. एमओयू के नाम पर जमीन रोककर बैठने वाली और रोजगार न देने वाली कंपनियों पर कड़ा एक्शन क्यों नहीं लिया जाता? [09:14]
3. क्या प्लेसमेंट कैंपों के नाम पर सिर्फ आंकड़ेबाजी और बजट का खेल चल रहा है? [09:40]
छजीसगढ़ का टैलेंट और संसाधन दोनों दांव पर हैं [10:02]। यदि सरकार ने ठोस नीतियां बनाकर स्थानीय युवाओं को प्राथमिकता नहीं दी, तो 'विकास' का यह ढांचा सिर्फ कागजों और विज्ञापनों तक ही सीमित रह जाएगा [01:27]।

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