रविवार, 26 जुलाई 2026

मलाई की चाह में बीजेपी पहुंचे दलबदलुओं के हाथ लगा 'झुनझुना'

  मलाई की चाह में बीजेपी पहुंचे दलबदलुओं के हाथ लगा 'झुनझुना'


कांग्रेस और अन्य दलों से पाला बदलकर भाजपा का दामन थामने वाले दिग्गज हासिये पर; मूल कैडर के दबाव और आंतरिक असंतोष के चलते निगम-मंडलों में जगह मिलना मुश्किल


छत्तीसगढ़ में विधानसभा चुनाव के बाद सत्ता बदलते ही भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) में शामिल होने वाले दलबदलुओं की स्थिति अब 'ना घर के, ना घाट के' जैसी बन गई है [00:19]। सत्ता की मलाई खाने और बड़े पदों की चाहत में अपनी मूल पार्टी का साथ छोड़कर भाजपा का दुपट्टा ओढ़ने वाले नेताओं के हाथ अब सिर्फ पछतावा लगा है [00:28]।

वरिष्ठ पत्रकार कौशल तिवारी के अनुसार, लगभग ढाई साल पहले जब भूपेश सरकार की विदाई हुई, तब कांग्रेस और अन्य दलों के नेताओं का भाजपा में प्रवेश करने का मेला सा लग गया था [00:48]। भाजपा का दावा था कि 10 हजार से अधिक नेताओं और कार्यकर्ताओं ने पार्टी में निष्ठा जताई है [01:58]। लेकिन आज स्थिति यह है कि 'यूज एंड थ्रो' की राजनीति के तहत भाजपा ने इनमें से अधिकांश को पूरी तरह से किनारे कर दिया है [01:38]।

किस्मत सिर्फ एकाध की चमकी, बाकी को मिला सिर्फ 'झुनझुना'

इस पूरे दलबदल के खेल में किस्मत सिर्फ चिंतामणि महाराज की चमकी, जिन्हें कांग्रेस छोड़कर आते ही सरगुजा लोकसभा से टिकट दिया गया और वे जीतकर दिल्ली पहुंच गए [02:10]। लेकिन उनके अलावा बाकी दिग्गज नेताओं के हाथ खाली हैं:

 चंद्रशेखर शुक्ला: 350 सदस्यों वाली जंबो कार्यकारिणी में मात्र एक जगह मिली [02:30]।

 चोलेश्वर चंद्राकर अन्य: प्रभारी या आमंत्रित सदस्य बनाकर टहला दिया गया है [02:40]।

कोई भी बड़ा नेता केवल 'दरी बिछाने' या कार्यकारिणी का कागज जेब में लेकर घूमने के लिए पाला नहीं बदलता [02:49]। पावर, पद, प्रतिष्ठा और गाड़ी की उम्मीद में भाजपा का दामन थामने वाले नेताओं में अब भारी छटपटाहट देखी जा रही है [03:04]।

हाशिये पर धकेले गए कई बड़े चेहरे

निगम, मंडल और आयोगों में लाल बत्ती की उम्मीद लगाए बैठे पूर्व विधायकों, पूर्व महापौरों और प्रदेश स्तरीय पदाधिकारियों की लंबी फेहरिस्त अब उपेक्षा का शिकार है [03:14]। इनमें मुख्य रूप से शामिल हैं:

 प्रमोद शर्मा (पूर्व विधायक, बलौदाबाजार) [03:31]

 सफीरा साहू (पूर्व महापौर, जगदलपुर) [03:46]

 चुन्नीलाल साहू, विधान मिश्रा, शिशुपाल सूरी (पूर्व विधायक) [03:46]

 अरुण चौहान (पूर्व जिला पंचायत अध्यक्ष) [03:57]

 शीला तिवारी (पूर्व महिला कांग्रेस अध्यक्ष, बस्तर) [03:57]

 वाणी राव (पूर्व महापौर) एवं अनीता रावटे (पूर्व प्रदेश महिला कांग्रेस अध्यक्ष) [04:09]

 सीमा बघेल (पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की भाभी) [04:09]

 कमल झा (पूर्व अध्यक्ष, महिला कांग्रेस जगदलपुर) [04:20]

 यशवर्धन राव (पूर्व नेता प्रतिपक्ष, जगदलपुर) [04:20]

 महेश देवांगन (दिवंगत जंगी जी के करीबी) [04:31]

शादी-ब्याह के उपेक्षित मेहमानों की तरह इन नेताओं को पार्टी की बैठकों में बुला तो लिया जाता है, लेकिन नीतिगत फैसलों में इनकी कोई राय नहीं ली जाती [04:52]।

भाजपा कैडर का भारी दबाव और अंदरूनी अंतर्द्वंद्व

भाजपा द्वारा बाहरी नेताओं को दरकिनार करने के पीछे पार्टी के मूल कैडर का भारी विरोध मुख्य वजह माना जा रहा है [05:17]। सालों से पार्टी का झंडा उठाने और दरी बिछाने वाले निष्ठावान कार्यकर्ताओं ने साफ चेतावनी दे रखी है कि यदि सत्ता मिलने पर निगम-मंडलों के मलाईदार पद बाहर से आए लोगों को दिए गए, तो इसका कड़ा विरोध होगा [05:48]।

इसके साथ ही, भाजपा के भीतर भी गहरा अंतर्द्वंद्व चल रहा है [07:30]। विधायकों और मंत्रियों में असंतोष की खबरें सामने आ रही हैं, जिसके कारण डैमेज कंट्रोल की कोशिशें जारी हैं [07:52]। फिलहाल, विचारधारा छोड़कर सिर्फ सत्ता के पीछे भागने वाले दलबदलू नेताओं का भविष्य छत्तीसगढ़ की राजनीति में अनिश्चितता के भंवर में फंसा नजर आ रहा है [06:49]।

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