कुर्सी की मलाई, चौपट पढ़ाई: जब गुरुजी बने बाबू और हाई कोर्ट को देनी पड़ी चेतावनी!
क्लास रूम खाली, दफ्तर फुल
शिक्षा को किसी भी समाज की रीढ़ माना जाता है, लेकिन छत्तीसगढ़ में इस रीढ़ पर ही प्रशासनिक नाकामी और राजनीतिक सिफारिशों का वार चल रहा है [00:08]। आलम यह है कि जिन हाथों में चौक और डस्टर होना चाहिए, वे दफ्तरों में फाइलें पलटने और बिल पास करने में व्यस्त हैं [00:43]। एक तरफ बस्तर से लेकर सरगुजा तक ग्रामीण क्षेत्रों के सरकारी स्कूलों में बच्चे एक-एक शिक्षक के लिए तरस रहे हैं [01:04], वहीं दूसरी तरफ हजारों योग्य शिक्षक शहरों में मलाईदार गैर-शिक्षण पदों पर कब्जा जमाए बैठे हैं [00:43]।
2. कानून की धज्जियां: क्या कहता है RTE एक्ट?
शिक्षा का अधिकार (RTE) अधिनियम 2009 की धारा 27 बहुत स्पष्ट रूप से निर्देश देती है कि किसी भी शिक्षक को गैर-शिक्षकीय (Non-teaching) कार्यों में नहीं लगाया जा सकता [01:31]। इसके केवल तीन ही अपवाद हैं:
जनगणना [01:42]
आपदा राहत कार्य [01:42]
चुनाव ड्यूटी [01:42]
लेकिन छत्तीसगढ़ में नियम-कानूनों को ताक पर रखकर शिक्षकों को चपरासी, बाबू, समन्वयक और प्रशासनिक अधिकारी तक बना दिया गया है [01:56]।
3. हाई कोर्ट का कड़ा रुख और अल्टीमेटम
जब यह पूरा घालमेल हाई कोर्ट पहुंचा, तो अदालत ने सरकार की कार्यप्रणाली पर कड़ा ऐतराज जताया [00:25]। कोर्ट ने साफ शब्दों में कहा कि यह बच्चों के भविष्य के साथ खिलवाड़ है और सरकार को व्यवस्था सुधारने की अंतिम चेतावनी व अल्टीमेटम जारी कर दिया [02:16]।
4. सिस्टम का असली खेल: मलाईदार पोस्टिंग का गणित
प्रदेश के 146 विकासखंडों (Blocks) में DEO, ABO जैसे पदों पर प्रशासनिक संवर्ग (Administrative Cadre) के अधिकारियों की नियुक्ति होनी चाहिए [03:09]। लेकिन हकीकत यह है कि अधिकांश जगहों पर प्रिंसिपल और लेक्चरर (व्याख्याता) इन कुर्सियों पर काबिज हैं [03:23]।
यह खेल क्यों चल रहा है?
1. राजनीतिक संरक्षण और मलाईदार पद: ग्रामीण क्षेत्रों में पढ़ाने से बचने के लिए कई शिक्षक राजनीतिक पहुंच और पैसों की ताकत के दम पर शहर के दफ्तरों में टिके हुए हैं [04:22]।
2. प्रशासनिक नाकामी: राज्य निर्माण के 25 वर्षों बाद भी स्कूल शिक्षा विभाग में अपना प्रशासनिक कैडर खड़ा नहीं किया जा सका, जिससे 'प्रभारी राज' का शॉर्टकट अपनाया जा रहा है [04:55]।
5. नौनिहालों का दर्द: "नेतागिरी मत करो!"
जब शिक्षक दफ्तरों में एसी की हवा खा रहे हैं, तब दूर-दराज के स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे सड़कों पर उतरने को मजबूर हैं [05:42]। जब शासकीय उच्चतर माध्यमिक विद्यालय (आलीबारा) की छात्राएं 11वीं-12वीं के लिए शिक्षकों की मांग लेकर कलेक्टर कार्यालय पहुंचीं [06:03], तो उन्हें मदद के बजाय अधिकारियों की बदतमीजी और "जेल भिजवाने" जैसी धमकियां मिलीं [06:15]।
6. निष्कर्ष और यक्ष प्रश्न
हाई कोर्ट का यह फैसला केवल एक अदालती आदेश नहीं, बल्कि लाखों नौनिहालों के हक की लड़ाई है [08:31]।
क्या सरकार युक्ति-युक्तकरण के नाम पर केवल खानापूर्ति करेगी या वास्तव में शिक्षकों को वापस ब्लैकबोर्ड तक भेजेगी? [07:31]
क्या स्कूल शिक्षा विभाग में सालों से चले आ रहे 'प्रभारी राज' को खत्म कर स्थाई भर्तियां की जाएंगी? [08:21]
यदि समय रहते इस व्यवस्था को नहीं सुधारा गया, तो आने वाली पीढ़ियों का भविष्य अंधेरे में धकेलने का जिम्मेदार कौन होगा?

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