गुरुवार, 6 अगस्त 2026

रोज़ सवा करोड़ खर्च कर इमेज चमका रहे

 कर्ज के बोझ तले छत्तीसगढ़: रोजाना ₹1.33 करोड़ का 'इमेज बिल्डिंग' खेल



छत्तीसगढ़ में सरकार और सत्ता की प्राथमिकताओं को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। विधानसभा के पटल पर पेश किए गए आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, फरवरी 2024 से मार्च 2026 तक (लगभग सवा दो वर्षों में) राज्य सरकार ने सरकारी विज्ञापनों और प्रचार-प्रसार पर ₹1,095 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम राशि खर्च कर दी [01:38]। इसका सीधा गणित निकाला जाए तो प्रदेश में औसतन ₹1.33 करोड़ प्रतिदिन सिर्फ चेहरा चमकाने और विज्ञापनों पर बहाए जा रहे हैं [01:55]।

सवाल यह उठता है कि जिस राज्य की आधी आबादी आज भी बुनियादी सुविधाओं के अभाव से जूझ रही है, जहाँ दूरस्थ आदिवासी इलाकों में इलाज के बिना लोग दम तोड़ देते हैं, क्या वहाँ जनता के टैक्स के पैसे का इस तरह इस्तेमाल जायज है?

आंकड़ों का खेल: विकास या ब्रांडिंग?

विधानसभा में पेश बजट व प्रचार-प्रसार के आंकड़े बताते हैं कि छत्तीसगढ़ का यह प्रचार बजट देश के कई बड़े राज्यों यहाँ तक कि केंद्र के कई विभागों के अनुपात से भी काफी अधिक है [02:07]।

 कुल विज्ञापनों पर खर्च: ₹1,095 करोड़ [01:38]

 दैनिक औसत खर्च: ₹1.33 करोड़ प्रति दिन [01:55]

 प्रचार माध्यम: प्रमुख समाचार पत्र, टीवी चैनल, विशालकाय होर्डिंग्स, और सोशल मीडिया (Facebook, X/Twitter आदि) [03:50]।

सरकार का तर्क है कि महतारी वंदन योजना, धान खरीदी और जनकल्याणकारी योजनाओं की जानकारी जन-जन तक पहुँचाने के लिए यह प्रचार-प्रसार अनिवार्य है [04:27]। लेकिन विश्लेषकों का मानना है कि दूर-दराज के उन इलाकों में जहाँ मोबाइल नेटवर्क तक नहीं है, वहाँ इन महंगे विज्ञापनों से योजनाओं की जानकारी पहुँचना संदेहास्पद है [05:00]।

जमीनी हकीकत: चमकती तस्वीरों के पीछे का अंधकार

एक तरफ जहा चौराहों पर बड़े-बड़े विज्ञापनों के जरिए प्रदेश को 'समृद्ध' दिखाया जा रहा है, वहीं दूसरी तरफ जमीनी धरातल पर स्थिति बेहद चिंताजनक बनी हुई है:

1. स्वास्थ्य तंत्र की बदहाली: बस्तर और सुदूर वनांचल क्षेत्रों में आज भी मलेरिया, डायरिया जैसी सामान्य बीमारियों से लोगों की जानें जा रही हैं [02:37]। अस्पतालों में डॉक्टरों और जरूरी दवाइयों का अकाल है।

2. शिक्षा पर प्रहार: युक्तीकरण के नाम पर राज्य भर में हजारों सरकारी स्कूलों के ताले बंद किए जा रहे हैं या उनका विलय किया जा रहा है [07:42]।

3. पेयजल संकट: राज्य की राजधानी रायपुर तक में भीषण गर्मी के दिनों में पीने के एक गुंडी पानी के लिए लोगों को टैंकरों के पीछे भागना पड़ता है [06:24]।

कर्ज लेकर 'घी' पीने की नीति?

छत्तीसगढ़ की आर्थिक स्थिति पर नजर डालें तो राज्य पर कर्ज का बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है [07:34]। महतारी वंदन योजना और धान पर बोनस जैसी सब्सिडी देने के लिए सरकार को भारी कर्ज उठाना पड़ रहा है। ऐसे में वित्तीय घाटे से जूझ रहे राज्य के खजाने से करोड़ों रुपये केवल छवि चमकाने (इमेज ब्रांडिंग) के लिए निकालना राज्य के अर्थशास्त्र पर गंभीर सवाल खड़ा करता है [08:29]।

विशेषज्ञों का कहना है कि जब सरकारें भारी मात्रा में मीडिया घरानों को विज्ञापन जारी करती हैं, तो इससे निष्पक्ष पत्रकारिता पर भी सवालिया निशान खड़े होते हैं [09:10]।

कमीशनखोरी और प्रशासनिक इच्छाशक्ति का अभाव

इस पूरे खेल का एक दूसरा पहलू जनसंपर्क तंत्र की कमीशनखोरी और फिक्सिंग की चर्चाएं हैं [04:06, 05:30]। जब योजनाओं के क्रियान्वयन के लिए प्रशासनिक इच्छाशक्ति की जगह विज्ञापनों को ही सफलता का पैमाना मान लिया जाता है, तब विकास कागजों और होर्डिंग्स तक ही सीमित रह जाता है।

निष्कर्ष: जनहित या आत्ममुग्धता?

लोकतंत्र में जनता अपना टैक्स इसलिए देती है ताकि उसे सड़कें, अस्पताल, बेहतर शिक्षा और साफ पानी मिले [00:36]। लेकिन जब टैक्सपेयर्स का गाढ़ी कमाई का पैसा 'फर्स्ट इंप्रेशन' और अपनी राजनीतिक साख बचाने के लिए इस्तेमाल होने लगे, तो यह जनमत के साथ धोखे जैसा प्रतीत होता है [00:08, 06:38]।

छत्तीसगढ़ की जनता को अब यह तय करना होगा कि उन्हें होर्डिंग्स पर चमकता 'कागजी विकास' चाहिए या जमीनी स्तर पर बदलती उनकी जिंदगी।

वीडियो देखें 

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