प्रशासनिक तंत्र पर उठे सवाल
छत्तीसगढ़ का राजनीतिक माहौल इन दिनों एक बार फिर प्रशासनिक खींचतान और अफसरों की कार्यशैली को लेकर पूरी तरह गरमा गया है। सत्ता के गलियारों में प्रशासनिक तालमेल और नौकरशाही के रवैये पर सवाल खड़े होने लगे हैं। हाल ही में वरिष्ठ भाजपा नेताओं और सांसदों की ओर से आई प्रतिक्रियाओं के बाद राज्य की राजनीति में प्रशासनिक हस्तक्षेप और अधिकारों को लेकर बहस छिड़ गई है।
सांसदों का कड़ा रुख और विशेषाधिकार हनन का मामला
राजनीतिक हलकों में उस वक्त हलचल तेज हो गई जब रायपुर के सांसद बृजमोहन अग्रवाल और आईएएस अधिकारी अमित कटारिया के बीच फोन पर हुई बहस की खबरें सामने आईं। इस घटनाक्रम के बाद बृजमोहन अग्रवाल ने लोकसभा में विशेषाधिकार हनन की शिकायत दर्ज कराई। इसी कड़ी में दुर्ग के सांसद विजय बघेल ने भी अधिकारियों के रवैये से आहत होकर लोकसभा का रुख किया है।
विजय बघेल द्वारा 'मोदी की गारंटी' और अनियमित कर्मचारियों के मुद्दों को लेकर दिए गए बयानों के बाद प्रशासनिक स्तर पर संवादहीनता की स्थिति देखी गई, जिससे यह मामला और तूल पकड़ गया।
सत्ता के समीकरण और नौकरशाही की भूमिका
राजनीतिक विश्लेषकों और वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि राज्य में मौजूदा प्रशासनिक व्यवस्था में 2004-05 बैच के अधिकारियों का प्रभाव काफी बढ़ चुका है। मुख्य सचिव और मुख्यमंत्री सचिवालय से लेकर मैदानी जिलों तक तैनात कुछ अफसरों की कार्यशैली पर जनप्रतिनिधियों के काम में अनदेखी करने के आरोप लग रहे हैं।
चर्चा यह भी है कि राज्य में प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर दो प्रमुख केंद्र सक्रिय हैं—एक तरफ मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय और दूसरी तरफ वित्त मंत्री ओपी चौधरी। ऐसे में कई विधायक और सांसद महसूस कर रहे हैं कि नौकरशाही अपनी सीमाओं से बाहर जाकर काम कर रही है।
विधायकों में भी पनप रहा असंतोष
केवल सांसद ही नहीं, बल्कि कई प्रमुख विधायकों की तरफ से भी इसी तरह की शिकायतें उभरकर सामने आई हैं:
राजेश मूणत (रायपुर पश्चिम): प्रशासनिक निर्णयों और कार्यशैली को लेकर अपने स्पष्ट विचार रख चुके हैं।
ननकीराम कंवर: कोरबा जिले के प्रशासनिक रवैये और कलेक्टर के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए धरने तक पहुंच गए थे।
सरगुजा संभाग के प्रतिनिधि: सरगुजा क्षेत्र के कई विधायक स्थानीय प्रशासनिक अधिकारियों की कार्यप्रणाली की शिकायत लेकर पार्टी संगठन के वरिष्ठ नेताओं तक पहुंचे।
केदार कश्यप: बस्तर क्षेत्र में प्रशासनिक तालमेल को लेकर पूर्व में अधिकारियों से तीखी चर्चा की खबरें सामने आई थीं।
रमन सिंह कार्यकाल के 'प्रशासनिक आतंकवाद' से तुलना
राज्य की मौजूदा परिस्थितियों की तुलना पूर्व मुख्यमंत्री डॉ. रमन सिंह के कार्यकाल के उस दौर से की जा रही है, जब विपक्षी दलों द्वारा "प्रशासनिक आतंकवाद" जैसा शब्द इस्तेमाल किया जाता था। हालांकि, मौजूदा साय सरकार पर आधिकारिक रूप से ऐसा कोई तमगा नहीं लगा है, लेकिन जनप्रतिनिधियों और अधिकारियों के बीच बढ़ती खाई से शासन की साख पर असर पड़ रहा है।
प्रशासनिक माहौल में उपजे इस तनाव के कारण कई वरिष्ठ आईएएस और विशेष रूप से आईपीएस अधिकारी केंद्र सरकार की प्रतिनियुक्ति (डेपुटेशन) पर दिल्ली जाने के इच्छुक बताए जा रहे हैं।
आगे की राह और सरकार के सामने चुनौती
एक तरफ जहां सांसद और विधायक लगातार अपनी ही सरकार के प्रशासनिक तंत्र से अपनी नाराजगी जाहिर कर रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ सरकार के सामने जन प्रतिनिधियों और नौकरशाही के बीच संतुलन बनाए रखने की बड़ी चुनौती है। आने वाले दिनों में यदि और भी जनप्रतिनिधि खुलकर सामने आते हैं, तो यह मुद्दा राज्य सरकार के लिए एक बड़ा राजनीतिक संकट बन सकता है।

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