बस्तर में यूसीसी का बवाल और दूसरे समाजों की नाराजगी
देश में इन दिनों जिस एक मुद्दे पर सबसे ज्यादा सियासी गर्मी और वैचारिक उबाल है, वह है— समान नागरिक संहिता (UCC)। लेकिन इस कानून के नाम पर छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर राजधानी रायपुर तक और देश के अलग-अलग हिस्सों में जो सुगबुगाहट शुरू हुई है, उसने अब एक बड़े राजनीतिक और सामाजिक घमासान का रूप ले लिया है।
कल जगदलपुर कलेक्ट्रेट में जो कुछ हुआ, उसने साफ कर दिया है कि यूसीसी की यह राह इतनी आसान नहीं होने वाली है। एक तरफ बस्तर में सर्व आदिवासी समाज ने कलेक्ट्रेट का घेराव कर दिया, जमकर हंगामा हुआ, अधिकारियों से तीखी नोंकझोक हुई; तो वहीं दूसरी तरफ सिर्फ आदिवासी समाज ही नहीं, बल्कि कई अन्य सामाजिक संगठन और वर्ग भी इस बात को लेकर सुलग रहे हैं कि आखिर इस कानून के दायरे और रूपरेखा पर सरकार का रुख साफ क्यों नहीं है?
आज के इस रिपोर्ट में हम विस्तार से समझेंगे कि आखिर जगदलपुर में ऐसा क्या हुआ कि आदिवासियों को सड़कों पर उतरना पड़ा? सिर्फ बस्तर ही नहीं, बल्कि दूसरे समाज के लोग क्यों इस प्रक्रिया से नाराज चल रहे हैं? और इस पूरे मामले की सियासी और कानूनी परतें क्या कहती हैं? रिपोर्ट को आखिर तक बने पढ़ियेगा क्योंकि आज हम इसकी हर एक बारीक सच्चाई से पर्दा उठाने वाले हैं।"
जगदलपुर कलेक्ट्रेट में हंगामा— आखिर क्यों भड़का आदिवासी समाज?
"शुरुआत करते हैं बस्तर के जिला मुख्यालय जगदलपुर से। छत्तीसगढ़ सरकार ने यूसीसी का ड्राफ्ट और उस पर सुझाव लेने के लिए एक उच्च-स्तरीय समिति बनाई है। इसी सिलसिले में जगदलपुर कलेक्ट्रेट के प्रेरणा हॉल में एक परामर्श बैठक बुलाई गई थी।
सरकार का दावा था कि इसमें तमाम वर्गों और समुदायों के लोगों को बुलाकर उनकी राय ली जाएगी। लेकिन असली खेल यहीं से शुरू होता है!
बैठक शुरू होने से पहले ही जब सर्व आदिवासी समाज के कई प्रमुख प्रतिनिधियों को यह पता चला कि उनका नाम आमंत्रण सूची (Invitation List) में है ही नहीं, तो उनका गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। समाज के लोगों का कहना था कि बस्तर के मूल मालिकों और आदिवासियों को ही जब इस अहम चर्चा से बाहर रखा जाएगा, तो फिर यह बैठक किसके इशारे पर हो रही है?
देखते हीदेखते कलेक्ट्रेट परिसर रणक्षेत्र में बदल गया। सर्व आदिवासी समाज के लोग बड़ी संख्या में बाहर इकट्ठा हो गए और सरकार के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी। हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि प्रशासनिक अधिकारियों को खुद बीच-बचाव करना पड़ा और भारी गहमागहमी के बाद कुछ प्रतिनिधियों को अंदर जाने की अनुमति मिली।"
सात बड़े सवाल और आदिवासियों का कड़ा ऐतराज
अंदर बैठक तो जैसे-जैसे शुरू हुई, लेकिन असली विरोध तब सामने आया जब आदिवासी समाज ने सरकार के प्रतिनिधियों के सामने अपने सात तीखे सवाल रख दिए।
आदिवासियों का सीधा कहना है कि हमारे लिए संविधान की पांचवीं अनुसूची (5th Schedule) है, हमारे पास पेसा कानून (PESA Act) है, और हमारे अपने पारंपरिक रूढ़िगत कानून (Customary Laws) हैं जो सदियों से हमारी संस्कृति, हमारे जल, जंगल और जमीन की रक्षा करते आ रहे हैं।
समाज के नेताओं ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि:
- संविधानिक सुरक्षा का हनन: यदि यूसीसी यानी समान नागरिक संहिता लागू होती है, तो क्या हमारी रूढ़िगत परंपराएं, विवाह और उत्तराधिकार के स्थानीय नियम सुरक्षित रह पाएंगे?
- सांस्कृतिक पहचान पर खतरा: आदिवासी समुदाय अपनी पहचान को लेकर बहुत संवेदनशील है। उनका साफ कहना है कि देश में एक कानून का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि आदिवासियों की सदियों पुरानी विशिष्ट संस्कृति को मिटा दिया जाए।
- नाम बदलने पर भी रोष: सिर्फ यूसीसी ही नहीं, बल्कि बैठक के दौरान जब 'आदिम जाति कल्याण विभाग' का नाम बदलकर 'जनजाति कल्याण विभाग' किए जाने का मुद्दा उठा, उस पर भी समाज ने अपनी कड़ी आपत्ति दर्ज कराई। उनका मानना है कि इस तरह के बदलावों के पीछे एक सोची-समझी नीति है जो उनकी पहचान को प्रभावित कर सकती है।
यही वजह है कि सर्व आदिवासी समाज ने मांग की है कि आदिवासी समुदायों को यूसीसी के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा जाए।"
सिर्फ आदिवासी ही नहीं... दूसरे समाज और वर्ग भी क्यों हैं नाराज?
"अब जरा इस दायरे को थोड़ा और बड़ा करते हैं। क्या सिर्फ आदिवासी समाज ही यूसीसी के इस पूरे प्रोसेस से नाराज है?
बिल्कुल नहीं! अगर आप छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और सामाजिक गलियारों की थाह लें, तो पाएंगे कि सिर्फ आदिवासी ही नहीं, बल्कि कई अन्य समुदाय और वर्ग भी अंदर ही अंदर इस बात को लेकर बेहद खफा हैं।
- पारंपरिक और धार्मिक समुदायों की चिंताएं: चाहे अन्य पारंपरिक समुदाय हों या विभिन्न धार्मिक अल्पसंख्यक वर्ग, हर किसी के मन में यह डर बैठा हुआ है कि एक देश-एक कानून का यह मॉडल उनकी व्यक्तिगत पारिवारिक कानूनों (Personal Laws), रीति-रिवाजों और आस्था पर कुठाराघात साबित हो सकता है।
- संवादहीनता का आरोप: विभिन्न सामाजिक संगठनों का यह भी आरोप है कि सरकार जिस जल्दबाजी में यह परामर्श बैठकें कर रही हैं, उसमें पारदर्शिता की कमी है। जनता के बीच स्पष्ट रूप से यह बात नहीं रखी जा रही है कि इस ड्राफ्ट का आम नागरिकों के अधिकारों पर क्या असर पड़ेगा।
- राजनीतिक सुगबुगाहट: जानकारों का मानना है कि इस तरह के कानून जब बिना जमीनी आम सहमति के आगे बढ़ाए जाते हैं, तो समाज में दूरियां बढ़ने का खतरा पैदा हो जाता है। छत्तीसगढ़ में चूंकि अलग-अलग क्षेत्रों की अपनी सामाजिक और भौगोलिक विविधताएं हैं, इसलिए हर वर्ग यह पूछ रहा है कि क्या हमारी स्थानीय विशिष्टताओं को नजरअंदाज कर दिया जाएगा?"
सियासी नफे-नुकसान का खेल और आगे क्या?
"अब सवाल यह उठता है कि इस पूरे ड्रामे के पीछे की सियासत क्या है?
एक तरफ सरकार यह दलील दे रही है कि यूसीसी से देश में एकरुपता आएगी और सभी नागरिकों को समान अधिकार मिलेंगे। वहीं दूसरी तरफ विपक्ष और आदिवासी संगठन इसे सीधे तौर पर संविधान की पांचवीं और छठी अनुसूची पर हमला बता रहे हैं।
छत्तीसगढ़ की राजनीति में बस्तर हमेशा से एक संवेदनशील और निर्णायक क्षेत्र रहा है। ऐसे में आदिवासी समाज को नाराज करके कोई भी राजनीतिक दल बड़ा जोखिम नहीं उठाना चाहेगा। जगदलपुर कलेक्ट्रेट का यह हंगामा महज़ एक छोटी सी बानगी है, आने वाले दिनों में अगर सरकार ने इस पर स्थिति स्पष्ट नहीं की, तो यह आंदोलन पूरे राज्य में फैल सकता है।"
"तो कुल मिलाकर स्थिति यह है कि यूसीसी का यह मुद्दा अब सिर्फ कागजों पर चर्चा का विषय नहीं रहा, बल्कि यह सड़कों पर उतर चुका है। आदिवासियों का आक्रोश और अन्य समाजों की सुलगती नाराजगी इस बात की गवाही दे रही है कि सरकार को हर कदम बहुत फूंक-फूंक कर रखना होगा।
आपकी इस पूरे मामले पर क्या राय है? क्या आपको लगता है कि आदिवासियों को यूसीसी के दायरे से बाहर रखा जाना चाहिए? या फिर देश में वाकई एक कानून की सख्त जरूरत है?
