'डबल इंजन' में भ्रष्टाचार का हाई-स्पीड गियर? विकास की फाइलों पर 4 नहीं, अब 7 फीसदी कमीशन की 'अघोषित' जंग!
मंत्रालय के गलियारों से ग्राउंड जीरो तक की पड़ताल
पूर्व प्रधानमंत्री स्वर्गीय राजीव गांधी ने कभी देश के सामने एक कड़वी हकीकत बयां की थी कि "केंद्र से चलने वाला ₹1 जनता तक पहुंचते-पहुंचते महज 15 पैसे रह जाता है।" करीब चार दशक बाद आज छत्तीसगढ़ में भी यही सवाल फिर से जोर-शोर से गूंज रहा है। राज्य में भले ही 'डबल इंजन' की सरकार होने और भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े दावों के साथ सत्ता परिवर्तन हुआ हो, लेकिन मंत्रालय के बंद कमरों से छनकर आ रही खबरें चौकाने वाली हैं। प्रशासनिक हलकों और गलियारों में चर्चा आम है कि विकास कार्यों और केंद्रीय ग्रांट की फाइलों को आगे बढ़ाने के लिए 'कमीशन का रेट' 4 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी कर दिया गया है। इसी 'अघोषित तकरार' के चलते विकास की अरबों रुपयों की फाइलें मंत्रालय में धूल खा रही हैं।
₹6,700 करोड़ का भारी-भरकम बजट और प्यासी जनता
केंद्रीय वित्त आयोग (Finance Commission) के तहत छत्तीसगढ़ के नगरीय निकायों और पंचायतों को चमकाने, बुनियादी सुविधाएं सुधारने और आपदा प्रबंधन के लिए ₹6,700 करोड़ से अधिक की भारी-भरकम राशि जारी की जाती है। नियमतः इस राशि का आधा हिस्सा शुद्ध पेयजल और स्वच्छता (पानी और सफाई) पर खर्च होना अनिवार्य है।
लेकिन ग्राउंड जीरो की हकीकत भयावह है। एक तरफ जहां शहरों की नालियां बजबजा रही हैं और सफाई व्यवस्था भगवान भरोसे है, वहीं ग्रामीण इलाकों की तस्वीरें कलेजा कपा देने वाली हैं। भीषण गर्मी के इस दौर में जल जीवन मिशन और वित्त आयोग की राशि के बावजूद ग्रामीण बूंद-बूंद पानी के लिए तरस रहे हैं। कई गांवों में 1,000 से अधिक घरेलू नल सूखे पड़े हैं। ग्रामीणों को सिर पर गुंडी (बर्तन) रखकर दो से तीन किलोमीटर दूर दूसरे गांवों में पानी की तलाश में भटकना पड़ रहा है। 'जल संरक्षण दिवस' जैसी सरकारी औपचारिकताएं तो पूरी हो जाती हैं, लेकिन धरातल पर प्यास का सन्नाटा पसरा हुआ है।
टेंडर की शर्तों का 'मायाजाल' और चहेते ठेकेदारों की मोनोपॉली
इस पूरे खेल की शुरुआत जमीनी स्तर पर नहीं, बल्कि मंत्रालय स्तर से ही शुरू हो जाती है। सूत्रों के मुताबिक, वित्त आयोग की राशि से होने वाले कार्यों के लिए टेंडरों में ऐसी जटिल और चुनिंदा शर्तें (Conditions) जोड़ दी जाती हैं, जिससे आम या स्थानीय ठेकेदार रेस से बाहर हो जाएं। इसके चलते कुछ खास और 'चहेते ठेकेदारों' की मोनोपॉली (एकाधिकार) स्थापित हो चुकी है। स्थानीय स्तर के जनप्रतिनिधि और अधिकारी इस बड़े खेल के आगे मूकदर्शक बने हुए हैं, क्योंकि पूरा ताना-बाना ऊपर से ही तय होकर आता है।
फाइलों पर लगी 'कमीशन' की दीमक; 4% से बढ़कर हुआ 7%?
राजनीतिक और प्रशासनिक गलियारों में सबसे बड़ी चर्चा कमीशन की दरें बढ़ने को लेकर है। विभागीय सूत्रों की मानें तो पहले जहां केंद्रीय ग्रांट की फाइलों को हरी झंडी दिखाने के लिए कथित तौर पर 4 फीसदी का लेन-देन चर्चाओं में रहता था, वहीं अब इसे बढ़ाकर 7 फीसदी किए जाने की मांग हो रही है। यही वजह है कि जब तक यह 'डील' फाइनल नहीं होती, तब तक विकास कार्यों की फाइलें वित्त और संबंधित मंत्रालयों के दफ्तरों से आगे नहीं खिसक पा रही हैं।
विपक्ष और कांग्रेस के ग्रामीण अध्यक्षों (जैसे पप्पू बंजारे व अन्य) ने भी सरकार को घेरते हुए आरोप लगाया है कि प्रदेश में विकास कार्य पूरी तरह ठप पड़ गए हैं। विधानसभा के भीतर भी विपक्ष ने पुरजोर तरीके से यह मुद्दा उठाया था कि विकास कार्यों की प्रशासनिक स्वीकृति होने के बावजूद वित्त मंत्रालय फाइलों को दबाकर बैठा हुआ है।
रडार पर भारी-भरकम मंत्रालय: मंत्रियों की खामोशी पर सवाल
इस पूरी व्यवस्था में उन प्रमुख मंत्रालयों पर उंगलियां उठ रही हैं, जिनके पास ग्रामीण और शहरी विकास का सीधा जिम्मा है:
1. पंचायत एवं ग्रामीण विकास मंत्रालय (मंत्री: विजय शर्मा): जहां ग्रामीण क्षेत्रों की पेयजल व्यवस्था और पंचायतों के ग्रांट की फाइलें अटकी पड़ी हैं।
2. नगरीय प्रशासन एवं विकास मंत्रालय (उपमुख्यमंत्री व मंत्री: अरुण साव): जल जीवन मिशन में हो रही कथित गड़बड़ियों और शहरी निकायों की बदहाली को लेकर विधानसभा से लेकर सड़क तक घिरे हुए हैं।
3. वित्त मंत्रालय (मंत्री: ओ.पी. चौधरी): जिन पर विपक्ष ने सीधे तौर पर 'चेहरा देखकर' फाइलों को मंजूरी देने और जानबूझकर विकास के बजट को रोकने का आरोप लगाया है।
जनता का सवाल: भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाने' के वादे का क्या हुआ?
चुनाव के वक्त मंचों से दहाड़ते हुए बड़े-बड़े नेताओं ने दावा किया था कि भ्रष्टाचारियों को 'उल्टा लटकाकर सीधा' कर दिया जाएगा। लेकिन आज जब केंद्र और राज्य दोनों जगह एक ही दल की सरकार है, तब भी यदि केंद्रीय पैसे का एक बड़ा हिस्सा बीच रास्ते में ही दम तोड़ रहा है, तो आम जनता खुद को ठगा हुआ महसूस कर रही है। देखना होगा कि विकास की इन फाइलों से '7 फीसदी' का यह अघोषित ग्रहण कब हटता है और छत्तीसगढ़ के प्यासे गांवों तक पानी कब पहुंचता है।

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें