ढाई हजार करोड़ की 'पैरी परियोजना' और 'सिंडिकेट' का खेल
हाईकोर्ट से हरी झंडी, लेकिन पारदर्शिता पर उठे गंभीर सवाल; क्या भोपाल-नागपुर कनेक्शन से आसान हुई दिलीप बिल्डकॉन की राह?
जब सरकार ढाई हजार करोड़ रुपये जैसी विशालकाय राशि का ढांचागत (Infrastructure) प्रोजेक्ट लेकर आती है, तो यह केवल सीमेंट, गिट्टी, कंक्रीट और पाइपलाइन बिछाने का साधारण मामला नहीं होता। [00:08] यह सीधे तौर पर जनता के पसीने की कमाई और टैक्स के पैसों का मामला होता है। [00:17] यही वजह है कि जब भी ऐसी महात्वाकांक्षी योजनाएं धरातल पर उतरती हैं, तो नेताओं, अफ़सरों, ठेकेदारों और दलालों का एक बड़ा सिंडिकेट अपनी नज़रें गड़ा लेता है। [00:26]
हाल ही में छत्तीसगढ़ के जल संसाधन विभाग द्वारा शुरू की गई पैरी परियोजना [00:40] (सिकासेर जलाशय से कोडार जलाशय तक बड़ी लिंक नहर और पाइपलाइन निर्माण) को लेकर उठा बवंडर इस बात का साफ़ प्रमाण है। [01:06] प्रोजेक्ट के ऐलान के साथ ही इसके टेंडर की प्रक्रिया विवादों के घेरे में आ गई और मामला हाईकोर्ट के दरवाज़े तक पहुँच गया। [01:06]
भले ही उच्च न्यायालय ने तकनीकी आपत्तियों और याचिकाओं को खारिज करते हुए टेंडर हासिल करने वाली कंपनी दिलीप बिल्डकॉन (Dilip Buildcon) का रास्ता साफ कर दिया हो [01:14], लेकिन इस पूरी प्रक्रिया ने राज्य के प्रशासनिक गलियारों में 'सत्ता, सिंडिकेट और कॉरपोरेट नेक्सस' की एक नई बहस को जन्म दे दिया है। [01:26]
आधी रात को फैसला: क्या था टेंडर का पूरा घटनाक्रम?
पैरी परियोजना छत्तीसगढ़ के किसानों के लिए निस्संदेह बेहद फायदेमंद और सिंचाई व्यवस्था का कायाकल्प करने वाली योजना है। [02:31] सिकासेर से कोडार जलाशय तक पाइपलाइन और लिंक नहर बिछने से लाखों हेक्टेयर कृषि भूमि को पानी मिलेगा। [02:44] इसलिए परियोजना की मंशा और उपयोगिता पर कोई सवाल नहीं है [02:55], लेकिन सवाल उठे हैं टेंडर आवंटन के तरीके पर [02:55]:
1. मई-जून का टेंडर चक्र: मई में परियोजना के लिए टेंडर जारी किया जाता है और जून भर प्रक्रिया चलती है। [03:06]
2. 'शुद्धि-पत्र' (Corrigendum) का खेल: प्री-बिड (Pre-Bid) बैठकों के दौरान तकनीकी शर्तों में अचानक ऐसे संशोधन और 'शुद्धि-पत्र' जोड़े जाते हैं, जिसने कई स्थानीय व मंझे हुए ठेकेदारों के गणित को बिगाड़ दिया। [05:16]
3. समय देने से इनकार: जब प्रतिद्वंद्वी कंपनियों ने शर्तों में हुए बदलाव का अध्ययन करने और नए सिरे से कागज़ात जमा करने के लिए समय सीमा बढ़ाने की मांग की, तो विभाग ने उसे ठुकरा दिया। [04:32]
4. आधी रात की घोषणा: जुलाई के अंतिम सप्ताह में अचानक आधी रात को दिलीप बिल्डकॉन को L-1 (लॉएस्ट बिडर) घोषित कर दिया गया। [03:16]
शर्तों के इस फेरबदल और समय न दिए जाने को लेकर असंतुष्ट पक्ष हाईकोर्ट पहुँचे। [03:30] हालांकि, हाईकोर्ट ने याचिकाओं को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि "याचिकाकर्ता अपने आरोपों के समर्थन में पक्षपात, दुर्भावना या किसी विशेष पक्ष को अनुचित लाभ पहुँचाने का कोई ठोस विधिक आधार प्रस्तुत नहीं कर पाए।" [03:41]
कानूनी रूप से रास्ता भले साफ हो गया हो, लेकिन नैतिक और प्रशासनिक पारदर्शिता पर उठते सवाल अब भी अनुत्तरित हैं। [05:40]
भोपाल से नागपुर तक: 'पॉवर कॉरिडोर्स' का प्रभाव?
इस पूरे मामले में सबसे ज़्यादा चर्चा जिस पहलू की है, वह है—'भोपाल और नागपुर कनेक्शन'। [01:37] छत्तीसगढ़ के राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा जोरों पर है कि किस तरह मध्य प्रदेश और केंद्रीय स्तर के 'पॉवर कॉरिडोर्स' का इस्तेमाल कर टेंडर के समीकरणों को प्रभावित किया गया। [01:48]
दिलीप बिल्डकॉन का उभार: भोपाल से शुरुआत करने वाली कंपनी 'दिलीप बिल्डकॉन' और उसके कर्ताधर्ता दिलीप सूर्यवंशी का नाम मध्य प्रदेश के राजनीतिक परिदृश्य में नया नहीं है। [06:03] मध्य प्रदेश में पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान के कार्यकाल के दौरान इस कंपनी ने अभूतपूर्व तरक्की की और एक छोटे ठेकेदार से देश की अग्रणी इंफ्रास्ट्रक्चर कंपनी बन गई। [06:14]
नागपुर और राष्ट्रीय नेटवर्क: चर्चाएं यह भी हैं कि मध्य प्रदेश में मिली सफलता के बाद कंपनी का प्रभाव राष्ट्रीय राजमार्गों और केंद्रीय इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स तक फैला, जहाँ केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय (नागपुर लॉबी) के तहत बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स हासिल किए गए। [06:46]
छत्तीसगढ़ में एंट्री का पैटर्न: जानकारों का मानना है कि छत्तीसगढ़ में 2,500 करोड़ रुपये के इस महा-प्रोजेक्ट में भी उसी पुराने राजनीतिक अप्रोच और 'नेक्सस' का सहारा लिया गया [07:19]। टेंडर प्रक्रिया के अंतिम चरण में जो 'शुद्धि-पत्र' लाया गया, उसे इसी राजनीतिक छत्रछाया का नतीजा माना जा रहा है। [07:27]
प्रशासनिक घालमेल या राजस्व का बड़ा नुकसान?
इस पूरे घटनाक्रम से तीन ऐसे गंभीर प्रशासनिक और आर्थिक सवाल खड़े होते हैं, जिनका जवाब सरकार और जल संसाधन विभाग को देना होगा:
1. कम प्रतिस्पर्धा (Low Competition) से घाटा: कठोर और अचानक बदली गई शर्तों की वजह से कई राष्ट्रीय व राज्यस्तरीय प्रतिस्पर्धी रेस से बाहर हो गए। जब बिडिंग में प्रतिस्पर्धा कम होती है, तो क्या सरकार को प्रतिस्पर्धी दरें (Competitive Rates) मिल पाती हैं? क्या इससे राज्य के खजाने को भारी राजस्व नुकसान पहुँचा? [07:47]
2. पारदर्शिता बनाम कानूनी वैधता: हाईकोर्ट का फैसला प्रक्रिया को कानूनी रूप से वैध (Technically Legal) भले बना दे [05:40], लेकिन क्या आधी रात को टेंडर फाइनल करना और शुद्धि-पत्र के नाम पर प्रतिस्पर्धा को सीमित करना एक पारदर्शी सरकार के दावों पर खरा उतरता है? [04:12]
3. 30 महीने और 5 साल का मेंटेनेंस: अनुबंध के मुताबिक, दिलीप बिल्डकॉन को 30 महीने के भीतर सिकासेर से कोडार तक का काम पूरा करना है और 5 साल तक रख-रखाव (Maintenance) की ज़िम्मेदारी संभालनी है। [04:41] क्या पूर्व में विवादित रही प्रक्रियाओं के बाद यह कंपनी गुणवत्ता और समय-सीमा के मानकों पर खरी उतर पाएगी? [05:02]
बड़ा सवाल: विकास या सिंडिकेट का विस्तार?
छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन के बाद सुशासन और शून्य भ्रष्टाचार के बड़े-बड़े दावे किए गए थे। लेकिन पैरी परियोजना में जिस तरह 'भोपाल-नागपुर' के रसूखदार कनेक्शन की छाया देखने को मिली है, उससे क्षेत्रीय ठेकेदारों और आम जनता में असंतोष है। [01:37]
हाईकोर्ट के फैसले ने भले ही विभागीय अफसरों और संबंधित कंपनी को फिलहाल राहत दे दी हो [05:40], लेकिन जनता की अदालत में यह सवाल तैर रहा है—क्या यह 2500 करोड़ का प्रोजेक्ट किसानों की किस्मत बदलने के लिए है, या फिर पड़ोसी राज्यों से संचालित होने वाले कॉरपोरेट-राजनीतिक सिंडिकेट की तिजोरियाँ भरने का नया ज़रिया? [00:08]
इस पूरे खेल का कच्चा-चिट्ठा अब सामने आ चुका है [02:09]। आने वाले दिनों में यह देखना दिलचस्प होगा कि प्रोजेक्ट की गुणवत्ता और निर्माण की गति पर जनता और मीडिया की निगरानी कितनी कड़क रहती है। [08:07]
प्रमुख बिंदु (Box Highlights for Magazine)
परियोजना का नाम: पैरी परियोजना (सिकासेर जलाशय से कोडार जलाशय लिंक नहर एवं पाइपलाइन निर्माण) [00:51]
कुल अनुमानित लागत: लगभग ₹2,500 करोड़ [00:00]
आवंटित कंपनी: दिलीप बिल्डकॉन (भोपाल आधारित) [01:14]
समय-सीमा: 30 माह निर्माण + 5 साल मेंटेनेंस [05:02]
प्रमुख विवाद: अंतिम समय में शुद्धि-पत्र (Corrigendum), बिड जमा करने हेतु समय न देना और आधी रात को L-1 घोषित करना।

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