जब किताबों की जगह तख्तियाँ उठाने को मजबूर हुई ‘जेन अल्फा’
डिजिटल दौर का नया चेहरा और सड़कों पर उतरता बचपन
जिस ‘जेन-अल्फा’ (Gen Alpha)—अर्थात 2010 के बाद जन्मी उस पीढ़ी—को दुनिया आमतौर पर स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की दुनिया में खोया हुआ मानती है, वही पीढ़ी आज छत्तीसगढ़ के बस्तर से लेकर सरगुजा तक अपने बुनियादी अधिकारों के लिए सड़कों पर संघर्ष कर रही है [00:08]।
तेज धूप हो या मूसलाधार बारिश, कोरबा से कांकेर और मरवाही से सरगुजा तक—सरकारी और एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूलों के हजारों नौनिहाल आज किताबों की जगह हाथों में शिकायत की तख्तियाँ लेकर राष्ट्रीय और राज्य राजमार्गों पर चक्काजाम करने को विवश हैं [00:31]।
इन बच्चों के सवाल बेहद सादे लेकिन पूरी प्रशासनिक व्यवस्था को कटघरे में खड़ा करने वाले हैं:
“हमें हॉस्टलों में कीड़े लगा और घटिया खाना क्यों दिया जाता है?” [00:57]
“पीने के लिए दूषित पानी क्यों मिलता है?” [01:08]
“आवाज उठाने पर हमारे परिजनों को क्यों धमकाया जाता है?” [01:17]
“सड़कें जर्जर क्यों हैं और घटिया साइकिलों के नाम पर यह कैसा खेल चल रहा है?” [01:30]
इनमें से अधिकांश छात्र आदिवासी, दलित और पिछड़े वर्गों से आते हैं [01:39]। जिस वर्ग के कल्याण और सामाजिक उत्थान के नाम पर राज्य और केंद्र सरकारें हर साल अरबों-खरबों रुपये के बजटीय आवंटन का दावा करती हैं [02:02], उसी वर्ग के बच्चों को न्यूनतम रोटी, कपड़ा और स्वच्छ पानी के लिए अपना भविष्य दांव पर लगाना पड़ रहा है।
आंकड़ों की जुबानी: प्रशासनिक संवेदनहीनता का रिपोर्ट कार्ड
यदि जुलाई में नए शैक्षणिक सत्र की शुरुआत से लेकर अब तक की स्थिति पर नजर डालें, तो राज्य के विभिन्न हिस्सों में स्कूली बच्चे 39 से अधिक बार अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतर चुके हैं [02:24]।
उदाहरणात्मक रूप से, कोरबा जिले के छुरी स्थित एकलव्य मॉडल रेजिडेंशियल स्कूल के 300 छात्र अगस्त माह के दौरान तीन-तीन बार प्रशासनिक उपेक्षा से तंग आकर सड़कों पर बैठे [02:47]।
जब भी बच्चे चक्काजाम करते हैं, तो अमूमन यह घटनाक्रम देखने को मिलता है:
1. आश्वासन का दोहराव: ट्राइबल वेलफेयर विभाग के वरिष्ठ अधिकारी, पुलिस बल और स्थानीय प्रशासनिक अमला मौके पर पहुँचता है [03:08]।
2. कागजी दिलासा: बच्चों को जल्द कार्रवाई और सुधार का आश्वासन देकर धरना समाप्त कराया जाता है [03:18]।
3. वही ढाक के तीन पात: हफ्ते-दो हफ्ते बीतने के बाद स्थिति पुनः वैसी ही हो जाती है, और सुधार के नाम पर केवल नोटिसबाजी सिमट कर रह जाती है [03:45]।
प्रशासनिक अधिकारी यह जवाब देने में असमर्थ नजर आते हैं कि यदि यही स्थितियां किसी उच्च प्रशासनिक अधिकारी या जनप्रतिनिधि के बच्चों के हॉस्टल में होतीं, तो क्या सुधार की गति यही रहती? [04:14]
नीतिगत विरोधाभास: बजट का भारी आवंटन, मगर धरातल शून्य
छत्तीसगढ़ का यह समकालीन परिदृश्य राजनीति और सामाजिक न्याय के दावों के बीच एक बड़े विरोधाभास को रेखांकित करता है [04:32]। आदिवासी बहुल राज्य में शीर्ष प्रशासनिक और विभागीय दायित्वों पर इस वर्ग के प्रतिनिधियों की मौजूदगी के बावजूद [04:43], धरातल पर क्रियान्वयन की स्थिति अत्यंत चिंताजनक है।
यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर गड़बड़ी कहाँ है?
ठेकेदारी व सप्लाई तंत्र: क्या हॉस्टलों में घटिया राशन, जर्जर भवन और घटिया गुणवत्ता की सामग्री की आपूर्ति केवल निचले स्तर के ठेकेदारों की मिलीभगत है, या यह तंत्र ऊपर तक फैला हुआ है? [05:16]
जिला प्रशासन की निगरानी: जिले के प्रशासनिक प्रमुख (कलेक्टर) और विभागीय उप-आयुक्तों की नियमित निरीक्षण प्रणाली कहाँ सुप्त पड़ी है? [05:37]
संसाधनों का विचलन: शिक्षकों की भारी कमी के बावजूद सैकड़ों शिक्षकों को शैक्षणिक कार्यों के बजाय कलेक्टोरेट और अन्य प्रशासनिक दफ्तरों में संलग्न (अटैच) करके रखा गया है [07:21]।
युक्तीकरण (Rationalization) और व्यवस्था सुधार के नाम पर दर्जनों प्राथमिक व माध्यमिक शालाओं के समायोजन या बंद होने से ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी शिक्षा की पहुँच और कठिन हो गई है [07:46]।
भविष्य की चुनौती: जन-आक्रोश का नया केंद्र
हॉस्टलों और स्कूलों की यह अव्यवस्था केवल कमरों की दीवारों तक सीमित नहीं है। खराब सड़कों के कारण होने वाली दुर्घटनाएं, समय पर गणवेश व पाठ्यपुस्तकों का न मिलना और शिकायत करने पर मिलने वाली धमकियाँ अब इन छात्रों के बीच गहरे असंतोष का रूप ले रही हैं [06:46]।
यह स्थिति केवल प्रशासनिक ढिलाई नहीं, बल्कि शासन-प्रशासन के प्रति आम जन और नई पीढ़ी के घटते विश्वास का संकेत है [06:00]। यदि समय रहते इन नौनिहालों की बुनियादी आवश्यकताओं, शैक्षणिक माहौल और हॉस्टलों के भोजन-पानी की गुणवत्ता में ठोस व स्थायी सुधार नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह शांतिपूर्ण विरोध एक व्यापक सामाजिक आंदोलन का रूप ले सकता है [08:03]।
छत्तीसगढ़ के नीति-निर्धारकों के सामने आज सबसे बड़ा प्रश्न यही है: क्या राज्य का विकास केवल आंकड़ों की बाजीगरी में दिखाई देगा या उन दूरस्थ अंचलों के हॉस्टलों में भी पहुँचेगा जहाँ का बचपन आज सड़क पर न्याय मांग रहा है?

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