बस्तर में अब इस लाल आतंक का कहर
जब भी हम बस्तर का नाम सुनते हैं, हमारे ज़हन में गोलियों की गूँज, जंगलों की खामोशी और 'लाल आतंक' यानी नक्सलवाद की तस्वीर उभरती है। प्रशासनिक दावों की मानें तो बस्तर अब नक्सलमुक्त होने की राह पर है, बंदूकें शांत हो रही हैं और लाल आतंक का साया छँट रहा है।
लेकिन क्या बस्तर सच में लाल आतंक से मुक्त हो चुका है? कड़वी सच्चाई यह है कि बंदूक का लाल आतंक भले कम हो गया हो, लेकिन पानी का लाल आतंक आज भी बस्तर के फेफड़ों को घोंट रहा है। एक ऐसा लाल आतंक, जिसे किसी हथियार की ज़रूरत नहीं है—यह बहता है नदियों में, घुलता है गाँव वालों के पीने के पानी में, और चुपचाप लील रहा है आने वाली नस्लों को।
आज हम बात कर रहे हैं दंतेवाड़ा की शंखिनी और डंकिनी नदियों की—वे नदियाँ जो कभी बस्तर की जीवनरेखा थीं, लेकिन आज बैलाडीला की खदानों के 'रेड ऑक्साइड' और कचरे की वजह से खूनी लाल हो चुकी हैं।"
50-60 गाँवों की दास्तान
"शंखिनी और डंकिनी के इस विषैले लाल फेर में कोई एक-दो गाँव नहीं, बल्कि 50 से 60 गाँव फँसे हुए हैं। भांसी, गदापाल, गामवाड़े, बचेली, नेरली, मटेन, किरंदुल से लेकर दंतेवाड़ा के निचले मैदानी इलाकों तक फैली पूरी आबादी इस लाल पानी का अभिशाप झेल रही है।
सोचिए, जिस नदी के संगम पर प्रसिद्ध माँ दंतेश्वरी का पावन मंदिर स्थित है, उस नदी का पानी छूने लायक भी नहीं बचा।
- गाँव की औरतें पीने के पानी के लिए किलोमीटर दूर भटकने को मजबूर हैं।
- जो इस पानी को पीते हैं, वे पेट के गंभीर रोगों और लिवर की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
- पशु-पक्षी यह पानी पीकर मर रहे हैं।
- और सबसे भयानक—इन नदियों का लाल पानी जब खेतों में घुसता है, तो लहलहाती फसलें सड़ जाती हैं और ज़मीन हमेशा के लिए बंजर हो जाती है।"
विकास की कीमत और रेड ऑक्साइड का ज़हर
आखिर यह नदियाँ इतनी लाल कैसे हुईं? इसकी शुरुआत होती है बैलाडीला की पहाड़ियों से—जहाँ देश का सबसे बेहतरीन लोहा पाया जाता है। एनएमडीसी (NMDC) और खनन गतिविधियों के कारण लोहे का बारीक चूर्ण यानी 'रेड ऑक्साइड' और वाशिंग का कचरा सीधे शंखिनी नदी में बहा दिया जाता है।
शंखिनी आगे जाकर डंकिनी से मिलती है, और दोनों मिलकर इस पूरे अंचल को लाल रंग में रंग देती हैं। कभी शंखिनी का पानी इतना साफ हुआ करता था कि नदी की तली का शंख भी साफ दिखता था—इसीलिए इसका नाम शंखिनी पड़ा। लेकिन आज यह देश की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक मानी जाती है।
देश को यहाँ के लोहे से इंफ्रास्ट्रक्चर मिला, तरक्की मिली, अरबों का राजस्व मिला... लेकिन यहाँ के आदिवासियों को क्या मिला? लाल पानी, बीमारियाँ और अपनी ही ज़मीन पर बेबसी।"
बंदूकों से बड़ा संकट - 'धीमा ज़हर'
"लोग कहते हैं कि नक्सलवाद ने बस्तर को पीछे धकेला। यह बात सच है। लेकिन यह 'पानी का लाल आतंक' नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक है। नक्सली हमला सामने से होता है, लेकिन प्रदूषित पानी का यह ज़हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके पूरे परिवार को खत्म करता है।
- स्वास्थ्य संकट: त्वचा के रोग, अपंगता, और असमय मौत यहाँ के कई गाँवों में आम बात हो चुकी है।
- आर्थिक मार: किसान अब खेती नहीं कर पा रहे क्योंकि मिट्टी में लोहे की परत जम चुकी है।
- प्रशासनिक उपेक्षा: सालों से वाटर फ़िल्टर प्लांट और पाइपलाइन के वादे किए गए, कई योजनाएं बनीं, पर 50 से अधिक गाँवों की ज़मीनी हकीकत आज भी नहीं बदली।"
"अगर बस्तर को सच में 'मुक्त' करना है, तो उसे सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि इस लाल पानी के ज़हर से भी आज़ाद कराना होगा। जब तक शंखिनी और डंकिनी फिर से नीली और साफ़ नहीं होतीं, तब तक बस्तर के आदिवासियों के लिए 'लाल आतंक' कभी खत्म नहीं होगा।
क्या विकास की कीमत हमेशा आदिवासियों के जीवन और उनकी नदियों को देकर ही चुकाई जाएगी? यह सवाल हम प्रशासन और सरकार से पूछते हैं।
आपकी इस मुद्दे पर क्या राय है? कमेंट करके ज़रूर बताएं।

