शुक्रवार, 30 अक्टूबर 2026

बस्तर में अब इस लाल आतंक का कहर

 

बस्तर में अब इस लाल आतंक का कहर 


जब भी हम बस्तर का नाम सुनते हैं, हमारे ज़हन में गोलियों की गूँज, जंगलों की खामोशी और 'लाल आतंक' यानी नक्सलवाद की तस्वीर उभरती है। प्रशासनिक दावों की मानें तो बस्तर अब नक्सलमुक्त होने की राह पर है, बंदूकें शांत हो रही हैं और लाल आतंक का साया छँट रहा है।

लेकिन क्या बस्तर सच में लाल आतंक से मुक्त हो चुका है? कड़वी सच्चाई यह है कि बंदूक का लाल आतंक भले कम हो गया हो, लेकिन पानी का लाल आतंक आज भी बस्तर के फेफड़ों को घोंट रहा है। एक ऐसा लाल आतंक, जिसे किसी हथियार की ज़रूरत नहीं है—यह बहता है नदियों में, घुलता है गाँव वालों के पीने के पानी में, और चुपचाप लील रहा है आने वाली नस्लों को।

आज हम बात कर रहे हैं दंतेवाड़ा की शंखिनी और डंकिनी नदियों की—वे नदियाँ जो कभी बस्तर की जीवनरेखा थीं, लेकिन आज बैलाडीला की खदानों के 'रेड ऑक्साइड' और कचरे की वजह से खूनी लाल हो चुकी हैं।"

50-60 गाँवों की दास्तान

"शंखिनी और डंकिनी के इस विषैले लाल फेर में कोई एक-दो गाँव नहीं, बल्कि 50 से 60 गाँव फँसे हुए हैं। भांसी, गदापाल, गामवाड़े, बचेली, नेरली, मटेन, किरंदुल से लेकर दंतेवाड़ा के निचले मैदानी इलाकों तक फैली पूरी आबादी इस लाल पानी का अभिशाप झेल रही है।

सोचिए, जिस नदी के संगम पर प्रसिद्ध माँ दंतेश्वरी का पावन मंदिर स्थित है, उस नदी का पानी छूने लायक भी नहीं बचा।

  • गाँव की औरतें पीने के पानी के लिए किलोमीटर दूर भटकने को मजबूर हैं।
  • जो इस पानी को पीते हैं, वे पेट के गंभीर रोगों और लिवर की बीमारियों का शिकार हो रहे हैं।
  • पशु-पक्षी यह पानी पीकर मर रहे हैं।
  • और सबसे भयानक—इन नदियों का लाल पानी जब खेतों में घुसता है, तो लहलहाती फसलें सड़ जाती हैं और ज़मीन हमेशा के लिए बंजर हो जाती है।"

विकास की कीमत और रेड ऑक्साइड का ज़हर

आखिर यह नदियाँ इतनी लाल कैसे हुईं? इसकी शुरुआत होती है बैलाडीला की पहाड़ियों से—जहाँ देश का सबसे बेहतरीन लोहा पाया जाता है। एनएमडीसी (NMDC) और खनन गतिविधियों के कारण लोहे का बारीक चूर्ण यानी 'रेड ऑक्साइड' और वाशिंग का कचरा सीधे शंखिनी नदी में बहा दिया जाता है।

शंखिनी आगे जाकर डंकिनी से मिलती है, और दोनों मिलकर इस पूरे अंचल को लाल रंग में रंग देती हैं। कभी शंखिनी का पानी इतना साफ हुआ करता था कि नदी की तली का शंख भी साफ दिखता था—इसीलिए इसका नाम शंखिनी पड़ा। लेकिन आज यह देश की सबसे प्रदूषित नदियों में से एक मानी जाती है।

देश को यहाँ के लोहे से इंफ्रास्ट्रक्चर मिला, तरक्की मिली, अरबों का राजस्व मिला... लेकिन यहाँ के आदिवासियों को क्या मिला? लाल पानी, बीमारियाँ और अपनी ही ज़मीन पर बेबसी।"

बंदूकों से बड़ा संकट - 'धीमा ज़हर'

"लोग कहते हैं कि नक्सलवाद ने बस्तर को पीछे धकेला। यह बात सच है। लेकिन यह 'पानी का लाल आतंक' नक्सलवाद से भी ज्यादा खतरनाक है। नक्सली हमला सामने से होता है, लेकिन प्रदूषित पानी का यह ज़हर रोज़ थोड़ा-थोड़ा करके पूरे परिवार को खत्म करता है।

  • स्वास्थ्य संकट: त्वचा के रोग, अपंगता, और असमय मौत यहाँ के कई गाँवों में आम बात हो चुकी है।
  • आर्थिक मार: किसान अब खेती नहीं कर पा रहे क्योंकि मिट्टी में लोहे की परत जम चुकी है।
  • प्रशासनिक उपेक्षा: सालों से वाटर फ़िल्टर प्लांट और पाइपलाइन के वादे किए गए, कई योजनाएं बनीं, पर 50 से अधिक गाँवों की ज़मीनी हकीकत आज भी नहीं बदली।"

"अगर बस्तर को सच में 'मुक्त' करना है, तो उसे सिर्फ बंदूकों से नहीं, बल्कि इस लाल पानी के ज़हर से भी आज़ाद कराना होगा। जब तक शंखिनी और डंकिनी फिर से नीली और साफ़ नहीं होतीं, तब तक बस्तर के आदिवासियों के लिए 'लाल आतंक' कभी खत्म नहीं होगा।

क्या विकास की कीमत हमेशा आदिवासियों के जीवन और उनकी नदियों को देकर ही चुकाई जाएगी? यह सवाल हम प्रशासन और सरकार से पूछते हैं।

आपकी इस मुद्दे पर क्या राय है? कमेंट करके ज़रूर बताएं।

क्या गरीब बच्चों को अनपढ़ रखना चाहती है सरकार?

 शिक्षा का सच - क्या गरीब बच्चों को अनपढ़ रखना चाहती है सरकार?


अगर आपके घर में कोई बच्चा है, तो अगले कुछ मिनट अपनी आँखें और कान खोलकर इस खबर को सुनिए और देखिए। क्योंकि जो सच आज मैं आपको बताने जा रहा हूँ, वो यह साबित करने के लिए काफी है कि इस देश में गरीब के बच्चे को पढ़ाना तो दूर, उसे सुरक्षित माहौल में जीने तक का अधिकार नहीं दिया जा रहा है!"

"एक तरफ सरकारी स्कूलों के भवन जर्जर हैं, जंग लगे गेट कभी भी बच्चों के सिर पर गिर सकते हैं, आए दिन हादसे हो रहे हैं, स्कूलों में शिक्षक तक नहीं हैं! और दूसरी तरफ? दूसरी तरफ सरकार का कारनामा देखिए—RTE यानी Right to Education (शिक्षा का अधिकार) के तहत मिलने वाली मुफ़्त सीटों में सीधे-सीधे 59 हजार सीटों की कटौती कर दी गई!

जी हाँ, आपने बिल्कुल सही सुना! जहाँ 85 हजार बच्चों को निजी स्कूलों में मुफ्त शिक्षा मिलनी चाहिए थी, उसे घटाकर सीधे 26 हजार कर दिया गया! आखिर क्यों? क्या सरकार नहीं चाहती कि गरीब का बच्चा पढ़े? क्या शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव जी के पास इस बात का कोई जवाब है? आज हम खोलेंगे इस पूरी व्यवस्था की पोल!"

"चलिए सबसे पहले बात करते हैं सरकारी स्कूलों के ज़मीनी हालात की। दोस्तों, आज देश के तमाम सरकारी स्कूलों का हाल यह है कि भवन जर्जर हो चुके हैं। छतों से प्लास्टर गिरता है, दीवारों में दरारें हैं, और स्कूल के जो मेन गेट हैं, वे जंग खाकर इस कदर सड़ चुके हैं कि वे कभी भी मासूम बच्चों पर गिर सकते हैं। देश के कई राज्यों से लगातार ऐसी खबरें आ रही हैं जहाँ स्कूल का गेट गिरने या छज्जा गिरने से बच्चों की जान पर बन आई है।

सवाल यह है कि जब सरकार के पास बड़े-बड़े विज्ञापनों और नेताओं की गाड़ियों के काफिले के लिए करोड़ों का फंड है, तो इन मासूम बच्चों की सुरक्षा के लिए, बाउंड्रीवाल और गेट की मरम्मत के लिए बजट क्यों नहीं है?

और बात सिर्फ इंफ्रास्ट्रक्चर की नहीं है, शिक्षकों की भी भारी कमी है। एक-एक शिक्षक के भरोसे पूरा-पूरा स्कूल चल रहा है। क्या ऐसे पढ़ेगा इंडिया? क्या यही है वो मॉडल जिसकी कसमें खाई जाती हैं?"

"सरकारी स्कूल तो तबाह कर दिए गए, लेकिन जो गरीब परिवार अपने बच्चों को 'राइट टू एजुकेशन' (RTE) के तहत अच्छे प्राइवेट स्कूलों में पढ़ाना चाहते थे, उनके सपनों पर भी सरकार ने हथौड़ा चला दिया है।

स्क्रीन पर इस डेटा को ध्यान से देखिए— RTE के तहत जो सीटें पहले 85 हजार हुआ करती थीं, उन्हें इस साल घटाकर सीधे 26 हजार कर दिया गया! यानी लगभग 59 हजार गरीब बच्चे निजी स्कूलों में मुफ़्त पढ़ाई के अवसर से महरूम कर दिए गए!

यह आंकड़ा कोई हवा-हवाई नहीं है। इस फैसले के खिलाफ खुद प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन मैदान में उतर आई है!

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन के अध्यक्ष राजीव गुप्ता ने साफ शब्दों में इस फैसले का विरोध करते हुए कहा है कि 'RTE का मुख्यमकसद गरीब परिवारों के बच्चों को बड़े और गुणवत्तापूर्ण निजी स्कूलों में पढ़ाई का मौका देना है।' जब आप सीटें ही खत्म कर देंगे, तो ये गरीब बच्चे कहाँ जाएँगे?

और सबसे शर्मनाक बात जानते हैं आप क्या है? प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन इस मामले को लेकर हाई कोर्ट पहुँच गई है! जब कोर्ट में शिक्षा विभाग से जवाब माँगा गया, तो सरकार ने क्या दलील दी? सरकार का कहना है कि—'पैसों की कमी है!'"

"पैसों की कमी?! माननीय शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव जी, आपसे पूरा देश और गरीब जनता यह सवाल पूछ रही है— जब नेताओं के भत्तों की बात आती है, जब चुनाव प्रचार के बड़े-बड़े होर्डिंग्स लगाने होते हैं, जब मंत्रियों के बंगलों का नवीनीकरण होता है, तब पैसों की कमी क्यों नहीं होती? लेकिन जब गरीब के बच्चे को मुफ्त और अच्छी शिक्षा देने की बात आती है, तो आपके पास बजट नहीं होता?

गजेंद्र यादव जी, जब आपने शिक्षा मंत्री का पद संभाला था, तब आपने बड़े-बड़े दावे किए थे। लेकिन आज आपके कार्यकाल में—

  1. सरकारी स्कूल हादसों का अखाड़ा बने हुए हैं, गेट टूटने की कगार पर हैं।
  2. स्कूलों में शिक्षक नहीं हैं।
  3. और RTE के तहत 59,000 गरीब बच्चों की सीटें छीन ली गईं!

क्या आप यह बताना चाहेंगे कि ये 59,000 बच्चे अब कहाँ जाएँगे? क्या सरकार यह मान चुकी है कि गरीब का बच्चा सिर्फ मजदूरी करने के लिए पैदा हुआ है? शिक्षा मंत्री जी, अगर आप गरीब बच्चों को सुरक्षित स्कूल और मुफ़्त शिक्षा नहीं दे सकते, तो इस कुर्सी पर बैठने का आपको क्या नैतिक अधिकार है?"

संविधान हमें समानता और शिक्षा का अधिकार देता है। लेकिन जब सरकारें RTE जैसी योजनाओं का गला घोंटने लगें और सरकारी स्कूलों को खंडहर बनने के लिए छोड़ दें, तो समझ जाइए कि नियत में खोट है।

अगर गरीब का बच्चा पढ़-लिख गया, तो वो अपने अधिकारों के लिए सवाल पूछेगा। और शायद यही वजह है कि सरकारें शिक्षा पर खर्च करने से कतराती हैं।

प्राइवेट स्कूल एसोसिएशन कोर्ट गई है, लेकिन इस देश की सबसे बड़ी अदालत आप हैं—'जनता की अदालत'। अगर आज हम और आप शांत रहे, तो कल यह 26 हजार सीटें घटकर शून्य हो जाएँगी।

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